पिंडदान का स्थान सिर्फ़ गया क्यों ?
- ARYAN PIYUSH
- Jun 22
- 2 min read
Updated: Jul 18
"तीर्थों में गया श्रेष्ठ है, जहाँ विष्णु स्वयं पितरों के द्वार पर खड़े होते हैं।"
भारत में कई स्थानों पर पिंडदान किया जाता है — हरिद्वार, प्रयागराज, काशी, उज्जैन आदि।लेकिन फिर भी हर हिन्दू मनुष्य की आत्मा गया आने को क्यों कहती है ? क्या विशेष है गया जी में ?
पौराणिक कारण: जब भगवान विष्णु स्वयं पिंडदान में सम्मिलित हुए
गया का नामकरण एक राक्षस ‘गयासुर’ के नाम पर हुआ,जिसने घोर तप किया और वरदान माँगा —"मुझे ऐसा पुण्य दे दीजिए कि जो मुझे देखे, उसे मोक्ष मिल जाए।"
भगवान विष्णु को चिंता हुई कि यदि ये वरदान पूर्ण हुआ,तो जीवन और मृत्यु का संतुलन बिगड़ जाएगा।उन्होंने गयासुर से कहा कि उन्हें एक यज्ञ हेतु शरीर अर्पण करना होगा। गयासुर सहमत हुआ।उसके शरीर पर ही यज्ञ हुआ और आज भी विष्णुपद मंदिर उस स्थल पर स्थित है,जहाँ भगवान विष्णु ने गयासुर को मोक्ष का वरदान देकर अपने चरण चिह्न छोड़े।
जहाँ विष्णु ने अपने चरण रखे, वहाँ पितरों की आत्मा स्वयं पहुंचती है।
फल्गु नदी जल नहीं, एक कथा है
गया में बहने वाली फल्गु नदी सामान्य नदी नहीं।वह माता सीता के श्राप के कारण भूमिगत बहती है। पौराणिक कथा के अनुसार,जब सीता माता ने अकेले पिंडदान किया और राजा दशरथ को तृप्त किया,तो पाँच साक्षियों में से केवल अक्षयवट ने सत्य कहा। सीता जी ने फल्गु नदी को श्राप दिया:
तुम सतह पर नहीं बहोगी, तुम्हारा जल लुप्त हो जाएगा।
इसलिए आज भी फल्गु नदी सूखी दिखती है,परंतु उसके नीचे बहता जल पिंडदान की साक्षी बनता है।
अक्षयवट सत्य का प्रहरी
गया के अक्षयवट वृक्ष को आज भी विशेष पूजा मिलती है,क्योंकि यह ही वो साक्षी था जिसने माता सीता की बात की पुष्टि की। यह वृक्ष केवल एक पेड़ नहीं,बल्कि सत्य, धर्म और विश्वास की प्रतीक मूर्ति है।
पिंडदान का 'तीर्थराज' क्यों है गया ?
यहाँ भगवान विष्णु के चरण हैं
यहाँ फल्गु नदी, अक्षयवट, साक्षी स्थल हैं
गयावाल ब्राह्मणों की परंपरा रामायण काल से चली आ रही है
यहाँ 88 वेदियों (पिंड स्थलों) पर विशेष क्रमानुसार पिंडदान होता है
यहाँ का हर कण, हर पत्थर, हर घाट — आत्मिक शांति का केंद्र है
क्या अन्य स्थानों पर पिंडदान नहीं होता ?
होता है, अवश्य होता है। लेकिन जैसे हर शिवलिंग कैलाश नहीं होता,हर नदी गंगा नहीं होती,वैसे ही हर पिंडदान स्थल गया नहीं होता।
क्योंकि गया में श्रद्धा, इतिहास, और ईश्वर —तीनों एक साथ उपस्थित होते हैं।
क्या आप भी सोच रहे हैं कब जाएं ?
पितृपक्ष (भाद्रपद-अश्विन मास) सबसे उत्तम समय है
गया अमावस्या, महालय, श्राद्ध तिथि
या फिर कभी भी — क्योंकि गया में हर दिन तीर्थ है, हर क्षण तर्पण
गया सिर्फ़ एक जगह नहीं यह एक वचन है,जो हमने अपने पितरों से किया है |
Comments